अक्षय तृतीया का महत्त्व

पौराणिक ग्रंथों में अक्षय तृतीया दिवस का अभूतपूर्व महत्व दर्शाया गया है। इस पवित्र दिवस को अक्षय तीज और आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। वैशाख मास (अप्रैल -मई) में शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को ही अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस पावन दिवस पर किये गये सभी शुभ कार्यों का अविनाशी (अक्षय) फल प्राप्त होता है।

अक्षय तृतीया का महत्त्व
पद्म पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन दोपहर का समय अत्यंत शुभ होता है। इसी शुभ दिन पर महाभारत युद्ध का अंत हुआ था। द्वापर युग का उद्गमन भी अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था।

“न क्षय इति अक्षय – अर्थात – जिसका क्षय नहीं होता वह अक्षय है”
अक्षय तृतीया के दिवस पर वृक्षारोपण का भी बड़ा महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन पर पेड़ लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में खूब सफलता प्राप्त होती है। अक्षया तृतीया के दिन पर सर्व शक्तिमान भगवान नारायण, हायग्रीव भगवान और परशुराम भगवान के जन्म हुए हैं। इसलिये कई लोग इस दिन को पूर्वकथित भगवान् जी लोगों की जयंती के तौर पर भी मनाते हैं।

अक्षय तृतीया के दिन क्या-क्या कार्य किये जाते हैं:

वस्त्रों एवं आभूषणों की खरीददारी

सभी प्रकार के दान धर्म कार्य

जप-तप, हवन पूजा-पाठ

तर्पण, पिंड दान, पितृ कार्य

स्थापना उदघाटन

विवाह, संबंध, गृह प्रवेश

व्यापार उधयोग नवीनीकरण

धार्मिक स्थलों पर यात्रा

भूमि पूजन, नये अनुबंध

उत्तम पति की प्राप्ति के लिये कुंवारी कन्याओं को अक्षय तृतीया का व्रत अवश्य करना चाहिये

अक्षय तृतीया के दिन क्या क्या दान करें
अनाज, शक्कर, इमली, सब्जी, फल, फूल, कपड़े, सोना और चाँदी इन सभी वस्तुओं का दानअक्षय तृतीया के दिन करने पर बहुत पुण्य मिलता है।

प्रति वर्ष अक्षय तृतीया का पवित्र दिवस गर्मीयों के मौसम में आता है कई लोग इस मौसम में गरमी से त्रस्त होते हैं, इसलिये गरमी से बचाव के उपकरण दान करने का भी बड़ा महत्व है।

अक्षय तृतीया पूजा
इस पवित्र दिवस पर विष्णु भगवान तथा लक्ष्मी माँ के पूजन का बड़ा महत्त्व है। इस दिन पर स्वयं शुद्ध हो कर भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगा जल एवं अक्षत से स्नान कराना चाहिये और फिर भगवान को चावल अर्पण करने चाहिये।

अक्षय तृतीया दिवस पर भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा गंध, अक्षत, चंदन, पुष्प एवं धूप दीप के साथ की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी माँ को पवित्र तुलसी के पत्तों के साथ भोग लगाया जाता है। पाठ पूजा के सभी विधि-विधान पूर्ण कर लेने के उपरांत धूप-दिया कर के आरती-गान किया जाता है। गर्मी के मौसम में इमली और आम बहुतायत में आते हैं इसलिये यह दोनों फल भगवान को अर्पण किये जाते हैं।

अक्षय तृतीया मंत्र
ममाखिलपापक्षयपूर्वक सकल शुभ फल प्राप्तये

भगवत्प्रीतिकामनया देवत्रयपूजनमहं करिष्ये।

अक्षय तृतीया कथा (हिन्दू धर्म)
पूर्व काल में शाकल नगरी में धर्मदास नाम का एक प्रामाणिक वैश्य निवास करता था। धर्मदास स्वभाव से अति सरल और धार्मिक था। वह भगवान एवं देवी देवताओं का पूजन किया करता था। गरीबों और ब्राह्मणों को यथा शक्ति दान भी देता था। धर्मदास ने एक दिन वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि पर किये गये दान धर्म के अक्षय फल प्राप्त होने की बात को जान कर, उस दिन खूब सारा दान धर्म किया और देवी देवताओं का श्रद्धा भाव से पूजन भी किया।

प्रति वर्ष धर्मदास ने यह धार्मिक कार्य जारी रखा। अक्षय तृतीया के पावन दिन पर वह सुबह-सुबह गंगा स्नान कर के धर्मदास गेहूं, नमक, चीनी, गुड़, नारियेल, लड्डू, दहीं, सूत, चना, पानी से भरा हुआ मिट्टी का घड़ा इत्यादि दान करता (खाद्य पदार्थ, वस्त्र, तथा अन्य जीवन ज़रूरत की चीजों का दान) और श्रद्धा भाव से पूजा-पाठ करता। धर्मदास की पत्नी उसे कई बार दान-धर्म करने से रोकती, परंतु धर्मदास अक्षय तृतीया के दिन प्रति वर्ष अचूक दान-धर्म कार्य करता।

इस तरह समय बीतने लगा और कुछ सालों बाद धर्मदास की मृत्यु हो गयी। कहा जाता है कि धर्मदास का अगला जन्म कुशवाती नगर के राजा के रूप में हुआ। पूर्व जन्म में किये हुए धार्मिक कार्यों और अखंड अक्षय दान-धर्म के फल स्वरूप अगले जन्म में उन्हे राजयोग हुआ और वह राजा बने। अक्षय तृतीया कथा (जैन धर्म)

ऋषभदेव नामक प्रतापी राजा ने एक दिन सन्यास लेने का फैसला किया। उसके कुल एक सौ एक पुत्र थे। उन्होने अपनी संपत्ति और राज्य सभी पुत्रों में बराबर हिस्से में बाँट दिया।

मोह-माया त्यागने के उपरांत राजा ऋषभदेव छ: महीने तक कठोर तपस्या करते रहे। अपनी तपस्या के दौरान उन्होने अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया था। ६ महीनों के उपरांत जब वह ध्यान से बाहर आए तब उन्हे बहुत भूख लगी थी। वह कुछ भोजन कर के जल पीना चाहते थे।

प्रजाजन अपने राजा को ध्यान-तपस्या से बाहर आया देख उन्हे प्रसन्न करने के लिये तरह तरह के उपहार, हीरे, मोती, घोड़े, हाथी, कपड़े इत्यादि लाये। परंतु उस समय ऋषभदेव को इन सब चीजों की कामना नहीं थी। वह तो केवल अन्न का निवाला चाहते थे। इस घटना के बाद ऋषभदेव फिर से एक वर्ष की कठोर तपस्या में लीन हो गये। इस बार भी उन्होने पूरे एक वर्ष तक अन्न-जल ग्रहण नहीं किया।

फिर एक साल बाद राजा श्रेयांश ऋषभदेव से मिले। राजा श्रेयांश “पूर्व-भाव-स्मरण” एवं मन की बात बोले बिना समझ जाने की विद्या में निपुण थे। उन्होने ऋषभदेव के मन की बात समझ कर उन्हे गन्ने का रस पिला कर उनका उपवास पूर्ण कराया। जिस दिन राजा ऋषभदेव का यह कठोर उपवास पूर्ण हुआ वह अक्षय तृतीया का दिन था। जैन धर्म समुदाय के लोग इस प्रथा को “पारणा” भी कहते हैं।

अक्षय तृतीया कथा का महत्त्व
अक्षय तृतीया के दिन दान धर्म करने और इस व्रत से जुड़ी कथा सुनने पर जीवन में सुख, समृद्धि, यश और वैभव की प्राप्त होती है। इस पावन दिन पर शुभ मुहूर्त देखने की भी आवश्यकता नहीं है। अक्षय तृतीया के दिन किसी भी समय धार्मिक कार्य करने पर उत्तम पुण्य- फल प्राप्त होता है।

अक्षय तृतीया से जुड़ी विभिन्न धार्मिक मान्यतायेँ-
1)
पौराणिक मान्यता अनुसार गंगा नदी को जिस दिन भागीरथ धरती पर लाये थे वह शुभ दिन अक्षय तृतीया का दिन था। हिन्दू धर्म में गंगा नदी का बहुत बड़ा महत्त्व है। सच्चे दिल से पश्चाताप होने के उपरांत गंगा नदी में स्नान करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं।

2)
महाभारत काल में सम्राट युधिस्ठिर को अक्षय तृतीया के दिन ही “अक्षयपात्र” की प्राप्ति हुई थी। इस चमत्कारी पात्र में से कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था। इसी मान्यता अनुसार इस दिन पर किया जाने वाला दान और धर्म कार्य भी अक्षय माना जाता था।

3)
कई प्रान्तों में अक्षय तृतीया के दिन व्यापारी, उद्योगपति लिखित बहीखाते यानी ऑडिट बुक शुरू करते हैं।

4)
पंजाबी समुदाय के जाट लोग अक्षय तृतीया के दिन सुबह ब्रह्म मूरत पर अपने खेत- खलिहान पर जाकर खेती-बाड़ी काम-काज शुरू करते हैं। खेत पर जाते वक्त रास्ते में अगर पशु पक्षी मिले तों यह दृश्य आने वाले मौसम में अच्छी फसल और भरपूर बारिश का सांकेतक होता है। अक्षय तृतीय का दिन मौसम के बदलाव का सूचक भी होता है।

5)
भगवान कृष्ण के मित्र सुदामा जब अत्यंत गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे तब उन्हे उनकी पत्नी ने कृष्ण भगवान से सहायता मांगने को कहा था और तब सुदामा द्वारिका में कृष्ण भगवान से मिलने आए थे, यह दिव्य प्रसंग जब हुआ तब भी अक्षय तृतीया का दिन था। और जैसा की हम जानते हैं कृष्ण भगवान ने निर्धन सुदामा की सारी दरिद्रता दूर कर के उन्हें सुखी-सम्पन्न बना दिया था।

6)
अक्षय तृतीया का दिवस किसानों के लिये अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन उड़ीसा राज्य में भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है।

7)
अक्षय तृतीया के दिन विष्णु भगवान ने छठी बार परशुराम स्वरूप में अवतार लिया था। ऐसा कहा जाता है की परशुराम त्रेता युग एवं द्वापर युग में अमर रहे थे। परशुराम के माता पिता का नाम ऋषि जमदगनी तथा रेणुका देवी था। अक्षय तृतीया के दिन को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

8)
यह भी मान्यता है कि भगवान के दरबार के मुख्य खजांची कुबेर ने शिवपुरम में शिवजी की तपस्या कर के अक्षय तृतीया के दिन उन्हे प्रसन्न किया था। शिवजी ने कुबेर को जब वरदान मांगने को कहा तब कुबेर ने अपना सारा धन और संपत्ति माँ लक्ष्मी से पुनः पाने का वर मांगा। तभी शिवजी ने कुबेर को लक्ष्मी पूजन करने की सलाह दी थी। उसी दिन से अक्षय तृतीया पर लक्ष्मी पूजन की प्रथा शुरू हो गयी।

10)
एक मान्यता के अनुसार महाभारत काल में दुर्योधन के आदेश पर जब दुशास्शन ने द्रौपदी का चीर-हरण किया था तब द्रौपदी की लाज बचाने के लिये उसे श्री कृष्ण भगवान ने कभी ना खत्म होने वाली साड़ी का दान दिया था। द्रौपदी चीर हरण के समय जब कृष्णभगवान ने द्रौपदी की लाज बचाई वह दिन भी अक्षय तृतीया का दिन था।

11)
धार्मिक मान्यता अनुसार अच्छे वर की प्राप्ति, और संतान प्राप्ति के लिये अक्षय तृतीया व्रत करना चाहिये। माँ पार्वती भी इस व्रत के प्रताप से हर एक जन्म में शिवजी को पाती हैं। देवी इंद्राणी ने अक्षय तृतीया व्रत के प्रताप से ही संतान सुख पाया था। उन्हे इस व्रत के प्रताप से “जयंत” नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

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