स्वामी रामानंदाचार्य की जीवन कथा

भारतीय राष्ट्र को एक नई दिशा देने वाले संत रामानंद जी का जन्म 1299 में प्रयाग में हुआ था। श्री-संप्रदाय की दीक्षा उन्होंने काशी में स्वामी राघवानन्द जी से ली थी। स्वामी राघवनंद जी संत रामानुजाचार्य की चौथी पीढ़ी के संत थे। वे प्रेम और भक्ति के संत थे। भगवान राम के प्रति उनकी भक्ति ने देश को एक नई दिशा दी। राम के प्रति भारतीय समाज में तब लगाव था कि भगवान विष्णु ने राम जी के रूप में अवतार लिया था, लेकिन राम के प्रति विशेष भक्ति की परंपरा की नींव कम से कम उत्तर भारत में रामानंद जी ने रखी थी। दक्षिण भारत में तब राम भक्ति की परंपरा प्रबल थी, लेकिन उत्तर भारत में इस भक्ति को लाने का श्रेय रामानंद जी को ही दिया जाता है। रामानंद जी के समय भारत में बदलाव का दौर शुरू हो चुका था, यवनों का आक्रमण शुरू हो गया था। नफरत के सौदागर मंदिरों और मूर्तियों को तोडऩे में लगे थे। भारत पर इसलाम का प्रभाव शुरू हो चुका था, ऐसे समय में रामानंद ने देश को दिशा दी। प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाया। भारत में संत तो बहुत हुए, लेकिन जितना व्यापक प्रभाव रामानंदाचार्य जी का रहा, उतना किसी और का नहीं रहा। शिष्यों की एक विशाल फौज उन्होंने खड़ी की। भगवान राम के प्रति भक्ति के दरवाजे उन्होंने सभी के लिए खोल दिए। जातियों में बंटे देश को मजबूत करने के लिए आह्वान किया – जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।

उन्हीं के ज्ञान से उपजी वह धारा जिसने जयघोष किया कि जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान। तीर्थ यात्रा के लिए रामानंदाचार्य ने पूरे देश का भ्रमण किया था, उनका 100 साल से ज्यादा का जीवन रहा था। सात्विक और संत जीवन वाले रामानंदाचार्य जी ने जहां एक ओर सगुण धारा को प्रबल किया, जिसमें आगे चलकर तुलसीदास जी हुए, तो दूसरी ओर निर्गुण धारा को भी अवसर दिया, जिसमें संत कबीर हुए। तुलसीदास जी के लिए राम वही, जो दशरथ के पुत्र हैं, जिन्होंने रावण को दंड दिया। कबीर के लिए राम निरंकार हैं, कबीर ने राम जी को ‘साहब’ तक कहा है। रामानंदाचार्य भारतीय ज्ञान व दर्शन का वह मोड़ हैं, जहां से सभी के लिए रास्ता खुलता है। जहां धर्म और जाति के बंधन कमजोर पड़ जाते हैं। जहां हृदय से राम-राम सीताराम जपना ही मुक्ति का मार्ग है।

रामानंदाचार्य के नाम से रामानंद संप्रदाय चला और आज भी चल रहा है। जिसका मुख्यालय श्रीमठ, पंचगंगा घाट, वाराणसी है और संप्रदाय के वर्तमान आचार्य प्रबुद्ध संत गुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी हैं। राष्ट्र के एक विख्यात मुखर व्यक्तित्व, न्याय दर्शन के अतुलनीय विद्वान दर्शनशास्त्री स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने राम भक्ति ध्वजा को पूरी विद्वता व संतत्व के साथ उठाए रखा है। संप्रदाय में आज भी दरवाजे सभी जातियों और यहां तक कि अन्य धर्म के लोगों के लिए भी खुले हुए हैं।

संत श्री रामानंद जयंती
रामानंद जी की १७ जनवरी को जयंती मने जाती है उनके शिष्य जिन्हें दुनिया जानती हैरामानंदाचार्य के शिष्यों की संख्या हजारों में थी। गंगा किनारे पंचगंगा घाट पर उनके मठ में ही सैंकड़ों शिष्य एक साथ रहते थे। इन तमाम शिष्यों में १२ शिष्य प्रमुख बताए जाते हैं। 1 - अनंतानंद : ब्राह्मण थे। इनके शिष्य नरहर्यानंद के शिष्य गोस्वामी तुलसीदास हुए।

2 - पीपा : गागरोन गढ़ राजस्थान के क्षत्रिय राजा कवि भी थे, संत की तरह जीवन जीए।

3 - कबीर : अच्छे कवि थे, कर्म से जुलाहे थे। इनका अपना कबीरपंथी संप्रदाय चला।

4 - धन्ना : जाट कवि, राजस्थान के टोंक के धवन ग्राम के थे। सिक्खों में भी सम्मानित।

5 - सेनाचार्य : नाई व संत थे। बघेलखंड के रहने वाले थे। गुरुग्रंथ में शामिल कवि हैं।

6 - रविदास : चर्मकार व कवि थे, गृहस्थ थे, राम राम भजते चमड़े का काम करते थे।

7 - शिष्या सुरसरी : लखनऊ के पैखम ग्राम की थीं। दक्षिण भारत में सेवा को समर्पित हुईं।

8 - शिष्या पद्मावती : त्रिपुरा की थीं, शिष्या बनीं। वाराणसी में ही जनजागृति में जुटी रहीं।

9 - सुरसुरानंद : लखनऊ के पैखम ग्राम के थे। ये संत शिष्या सुरसरि के पति भी थे।

10 - सुखानंद : रामानंदाचार्य जी के पट शिष्यों में शामिल। राम भक्ति धारा को फैलाया।

11 - नरहरिदास : रामानंदाचार्य जी के पट शिष्यों में शामिल। राम भक्ति धारा की सेवा की।

12 - भावानंद : रामानंदाचार्य जी के पट शिष्यों में शामिल। राम भक्ति धारा में समर्पित हुए।

रामानंदाचार्य को दुनिया क्यों याद करे ?
1 - वे जातियों और धर्मों के बंधन को कट्टरता से नहीं देखते थे।

2 - उन्होंने दरवाजे मुस्लिमों के लिए भी खोले और शिष्य बनाए।

3 - उन्होंने शूद्रों या निचली जातियों को भी बढ़ाकर सशक्त किया।

4 - उन्होंने पहली बार स्त्रियों को भी दीक्षा देकर संत बना दिया।

5 - उन्होंने हिन्दू समाज को समता व सद्भाव की दृष्टि प्रदान की।

6 - भारत में प्रेम और भक्ति के महत्व को उन्होंने मजबूत किया।

7 - उत्तर भारत में राम को मर्यादापुरुषोत्तम रूप में स्थापित किया।

8 - उस राम जी को पूजना सिखाया, जो हर स्तर पर आदर्श हैं।

9 - उनसे निकली कबीरपंथी, रामसनेही, घीसापंथी, दादूपंथी धारा।

10 - रामानंदाचार्य के शब्दों को गुरुग्रंथ साहिब में भी स्थान मिला

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